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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
समीरणेनापि समो वलेन; समीरणस्यैव सुतो वलीय़ान् |  १५   क
स धर्मपाशेन सितोग्रतेजा; ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति