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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या; दुःशासनो यत्परुषाण्यवोचत् |  १७   क
तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं; दहन्ति मर्माग्निरिवेन्धनानि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति