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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते |  ४४   क
यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति