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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च वीजे; देवे च वर्षत्यृतुकालय़ुक्तम् |  २३   क
न स्यात्फलं तस्य कुतः प्रसिद्धि; रन्यत्र दैवादिति चिन्तय़ामि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति