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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि; ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या |  २५   क
ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश; स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति