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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गा; न्दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् |  ६   क
तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां; कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति