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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो; ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः |  ९   क
अजातशत्रुः पृथिवीतलस्थः; शेते पुरा राङ्कवकूटशाय़ी ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति