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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् |  १०५   क
लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनय़ेत्सुतम् |  १०५   ख
वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ||  १०५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति