वन पर्व  अध्याय २२६

वैशम्पाय़न उवाच

स प्रय़ाहि महाराज श्रिय़ा परमय़ा युतः |  १३   क
प्रतपन्पाण्डुपुत्रांस्त्वं रश्मिवानिव तेजसा ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति