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वन पर्व
अध्याय २२६
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वैशम्पाय़न उवाच
यां श्रिय़ं सुहृदश्चैव दुर्हृदश्च विशां पते |  १६   क
पश्यन्ति पुरुषे दीप्तां सा समर्था भवत्युत ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति