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वन पर्व
अध्याय २२६
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वैशम्पाय़न उवाच
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति |  १८   क
प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राघदर्शनात् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति