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वन पर्व
अध्याय २२६
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वैशम्पाय़न उवाच
सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनवाससम् |  २०   क
पश्यन्त्वसुखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुनः |  २०   ख
विनिन्दतां तथात्मानं जीवितं च धनच्युता ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति