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शान्ति पर्व
अध्याय २२७
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व्यास उवाच
उपपन्नं हि यत्प्राज्ञो निस्तरेन्नेतरो जनः |  १८   क
दूरतो गुणदोषौ हि प्राज्ञः सर्वत्र पश्यति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति