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शान्ति पर्व
अध्याय २२७
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व्यास उवाच
संस्कृतस्य हि दान्तस्य निय़तस्य कृतात्मनः |  २३   क
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिह लोके परत्र च ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति