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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा |  १   क
हृष्टो भूत्वा पुनर्दीन इदं वचनमव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति