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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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वृत्र उवाच
एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चि; त्सम्यक्च पश्यामि वचस्तवैतत् |  ५६   क
श्रुत्वा च ते वाचमदीनसत्त्व; विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति