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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अहमप्यद्य निश्चित्य गमनाय़ेतराय़ वा |  १४   क
काल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति