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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे |  १५   क
उपाय़ो यो भवेद्दृष्टस्तं व्रूय़ाः सहसौवलः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति