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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दुर्योधनं कर्णः प्रहसन्निदमव्रवीत् |  १८   क
उपाय़ः परिदृष्टोऽय़ं तं निवोध जनेश्वर ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति