वन पर्व  अध्याय २२७

वैशम्पाय़न उवाच

घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप |  १९   क
घोषय़ात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशय़ः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति