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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
उचितं हि सदा गन्तुं घोषय़ात्रां विशां पते |  २०   क
एवं च त्वां पिता राजन्समनुज्ञातुमर्हति ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति