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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रहसिताः सर्वे तेऽन्योन्यस्य तलान्ददुः |  २४   क
तदेव च विनिश्चित्य ददृशुः कुरुसत्तमम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति