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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
औजसं नाम तत्तीर्थं यत्र पूर्वमपां पतिः |  ९२   क
अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति