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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि द्वैतवने किञ्चिद्विद्यतेऽन्यत्प्रय़ोजनम् |  ५   क
उत्सादनमृते तेषां वनस्थानां मम द्विषाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति