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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डवान्सरथान्दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |  ८०   क
आनर्तं च दुराधर्षं शितैर्वाणैरवाकिरत् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति