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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
अव्यक्तस्य तथैश्वर्यं क्रमशः प्रतिपद्यते |  १५   क
विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युङ्क्ते स योगतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति