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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रय़ते नभः |  १७   क
तथा देहाद्विमुक्तस्य पूर्वरूपं भवत्युत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति