शान्ति पर्व  अध्याय २२८

व्यास उवाच

अथ धूमस्य विरमे द्वितीय़ं रूपदर्शनम् |  १८   क
जलरूपमिवाकाशे तत्रैवात्मनि पश्यति ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति