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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसञ्ज्ञकः |  २७   क
तत्राव्यक्तमय़ीं व्याख्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे |  २७   ख
तथा व्यक्तमय़ीं चैव सङ्ख्यां पूर्वं निवोध मे ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति