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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
चतुर्लक्षणजं त्वन्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते |  ३१   क
व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा वुद्धमथेतरत् |  ३१   ख
सत्त्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद्द्वय़मप्यनुदर्शितम् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति