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वन पर्व
अध्याय २२८
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धृतराष्ट्र उवाच
यूय़ं चाप्यपराध्येय़ुर्दर्पमोहसमन्विताः |  १०   क
ततो विनिर्दहेय़ुस्ते तपसा हि समन्विताः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति