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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
जहाराथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा वली |  ४७   क
पाण्डवं च विचेष्टन्तं किरातोऽप्यहनद्वलात् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति