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शल्य पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
जय़ राजंश्चिरं जीव जहि शत्रून्समागतान् |  ८   क
तव वाहुवलं प्राप्य धार्तराष्ट्रा महावलाः |  ८   ख
निखिलां पृथिवीं सर्वां प्रशासन्तु हतद्विषः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति