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वन पर्व
अध्याय २२८
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धृतराष्ट्र उवाच
अथ वा मद्वचः श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ |  १५   क
उद्विग्नवासो विश्रम्भाद्दुःखं तत्र भविष्यति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति