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वन पर्व
अध्याय २२८
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शकुनिरु उवाच
मृगय़ां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्धते भृशम् |  २०   क
स्मारणं च चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति