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वन पर्व
अध्याय २२८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |  २२   क
दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामतः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति