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वन पर्व
अध्याय २२८
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वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनेन च तथा सौवलेन च देविना |  २४   क
संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति