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वन पर्व
अध्याय २२८
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वैशम्पाय़न उवाच
तं निर्यान्तं महावाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः |  २५   क
पौराश्चानुय़युः सर्वे सहदारा वनं च तत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति