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सभा पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
स विनिर्जित्य राज्ञस्तान्करे च विनिवेश्य ह |  १८   क
धनान्यादाय़ सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति