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वन पर्व
अध्याय २२८
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वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ा चोचिता राजन्नस्मिन्काले सुतस्य ते |  ५   क
दुर्योधनस्य गमनं त्वमनुज्ञातुमर्हसि ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति