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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
स ताञ्शरैर्विनिर्भिन्दन्गजान्वध्नन्महावने |  ११   क
रमणीय़ेषु देशेषु ग्राहय़ामास वै मृगान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति