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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
सेनाग्रं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सरः |  १८   क
प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वाः समवारय़न् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति