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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़े समाज्ञाते सोदके समहीरुहे |  २   क
देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथं नराः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति