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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
चक्रैर्विमथितैः केचित्केचिच्छिन्नैर्महाध्वजैः |  १५   क
प्रत्यदृश्यन्त समरे तावका निहताः परैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति