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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षय़ित्वा त्रिहाय़नान् |  ६   क
वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत्कुरुनन्दनः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति