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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षय़े |  १८   क
प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति