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शान्ति पर्व
अध्याय १२२
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भीष्म उवाच
तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते |  ३   क
यत्र मुञ्जवटे रामो जटाहरणमादिशत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति