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स्त्री पर्व
अध्याय २३
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गान्धार्यु उवाच
प्रेतकृत्ये च यतते कृपी कृपणमातुरा |  ३७   क
हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति