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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सा सहसा वाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः |  १४   क
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति