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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन्महति वैशसे |  १३५   क
समेतानि वहून्यासन्भूतानि च जनाधिप ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति